हिन्दी विभागाध्यक्ष
रामपाल सिंह सत्यवती देवी महाविद्यालय
दातागंज, बदायूं
महात्मा ज्योतिबाफुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय , बरेली से संबद्ध
मैं डॉ. ज्योति सिंह, वर्तमान में रामपाल सिंह सत्यवती देवी महाविद्यालय, दातागंज, जनपद बदायूं में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हूँ। हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति मेरी गहरी आस्था और प्रेम ने ही मुझे शिक्षण और सृजन के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
मुझे इस क्षेत्र में कार्य करते हुए 14 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। इन वर्षों में मैंने न केवल अध्यापन को एक दायित्व के रूप में निभाया है, बल्कि इसे अपनी साधना और आत्मसंतोष का माध्यम बनाया है। विद्यार्थियों के बौद्धिक और भावनात्मक विकास के लिए समर्पित रहना ही मेरे जीवन का लक्ष्य रहा है।
मैंने अपनी एम.ए. (हिन्दी) की उपाधि एन.एम.एस.एन. दास कॉलेज से प्राप्त की, जहाँ मुझे स्वर्ण पदक (Gold Medal) से सम्मानित किया गया। यह मेरे शैक्षणिक जीवन का अत्यंत गर्वपूर्ण क्षण था।
इसके अतिरिक्त, मुझे मेरे उत्कृष्ट शैक्षणिक कार्यों और सामाजिक योगदान के लिए राज्यपाल पुरस्कार (Governor's Award) से भी सम्मानित किया गया है।
मेरी शोध रुचि के क्षेत्र हैं — स्त्री विमर्श, आधुनिक हिन्दी कविता, संस्कृति अध्ययन तथा भाषा-संवेदना का अंतर्संबंध। मैंने अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध लेख प्रकाशित किए हैं और हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत हूँ।
मैं मानती हूँ कि —
"शिक्षा केवल ज्ञान नहीं देती, वह जीवन के संस्कार गढ़ती है।"
साहित्य मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा का स्वर है। लेखन और शिक्षण, दोनों ही मेरे जीवन के दो ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे मुझे आत्मसंतोष, ऊर्जा और जीवन का उद्देश्य प्राप्त होता है।
"स्त्री केवल प्रेरणा नहीं, वह परिवर्तन की दिशा है।"
"साहित्य आत्मा की भाषा है, और शब्द उसका श्वास।"
— डॉ. ज्योति सिंह
वह सृष्टि की प्रथम नादिनी, जीवन का प्रथम स्पंदन है, उससे ही जग में बहती हर धारा, हर संबंध का आलंबन है। श्रद्धा से उसका नाम जपो, वह आराधना की सारिणी, नारी है तो धरा में बसती, जीवन की हर तारिणी। वह आँसू में भी दीप जलाए, मुस्कान में ममता का सागर, घर से गगन तक फैली उसकी, सुगंधित संवेदना अमर। बंधन तोड़े, राह रचे, निर्भय, निर्मल, महान, हर युग में उसने दिखलाया — नारी ही जग का सम्मान। वह जननी भी, वह चेतना भी, वह सरस्वती की बाणी, उसके बिना अधूरा जग, जैसे बिना दीप दीवाली। नमन उसे जो शक्ति स्रोत है, जो जीवन का उत्सव बनती है, उसके स्नेह में ही मानवता, अपना सत्य रचती है। हे नारी, तू करुणा, तू ज्वाला, तू संकल्प का अभियान, तेरे बिना अधूरी पूजा, अधूरी हर पहचान। तेरे आँचल में झूले धरती, तेरी गोद में आसमान, तू ही सृजन, तू ही जीवन — जय हो तेरा, नारी सम्मान।
ईमेल: contact@drjyotisingh.space
कार्यालय: हिन्दी विभाग, रामपाल सिंह सत्यवती देवी महाविद्यालय, दातागंज, बदायूँ